सदियों पुरानी परंपरा या हिंसा? इंदौर में हिंगोट युद्ध का सच

Hingto Yudh: इंदौर में कलंगी और तुर्रा योद्धाओं ने मनाई सदियों पुरानी परंपरा, देसी हथगोले लेकर भिड़े हिंगोट योद्धा, 15 घायल

इंदौर हिंगोट युद्ध: इंदौर जिले के गौतमपुरा में दिवाली के दूसरे दिन युद्ध होता है, जिसे हिंगोट युद्ध कहते हैं। 200 साल पुरानी परंपरा इस साल भी निभाई गई। शाम 5 बजे कलंगी और तुर्रा योद्धाओं ने युद्ध लड़ा। इसे देखने के लिए हजारों लोग जुटते हैं। इस युद्ध में दर्शकों और योद्धाओं समेत 15 लोग घायल हो गए।

सदियों पुरानी परंपरा या हिंसा? इंदौर में हिंगोट युद्ध का सच
सदियों पुरानी परंपरा या हिंसा? इंदौर में हिंगोट युद्ध का सच

दिवाली के दूसरे दिन परंपरा के नाम पर खेला गया हिंगोट युद्ध मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के गौतमपुरा में कलंगी और तुर्रा दलों के बीच जमकर खेला गया। करीब डेढ़ घंटे तक आसमान से देसी हथगोले बरसते रहे। डेढ़ घंटे तक चले युद्ध को देखने हजारों दर्शक पहुंचे। गौतमपुरा पूरे भारत में एकमात्र ऐसी जगह है, जहां सिर्फ यह हिंगोट युद्ध खेला जाता है। शुक्रवार को खेले गए इस अनोखे युद्ध में वहां मौजूद 15 से ज्यादा योद्धा और दर्शक घायल हो गए।

वहीं युद्ध के मैदान में सुरक्षा को देखते हुए पुलिस प्रशासन की ओर से 300 से ज्यादा पुलिस के जवान तैनात किए गए थे। साथ ही पुलिस के आला अधिकारी भी मौके पर मौजूद रहे। इस युद्ध में खेल रहे ज्यादातर योद्धा घायल हो गए। एसडीएम रवि वर्मा ने बताया कि 15 लोगों को मामूली चोटें आई हैं। ऐसे बनता है हिंगोट युद्ध की तैयारियां दिवाली से करीब दो महीने पहले से शुरू हो जाती हैं।

सदियों पुरानी परंपरा या हिंसा? इंदौर में हिंगोट युद्ध का सच
सदियों पुरानी परंपरा या हिंसा? इंदौर में हिंगोट युद्ध का सच

हिंगोट हिंगोरिया के पेड़ का फल है। नींबू के आकार के इस फल का बाहरी आवरण काफी सख्त होता है। युद्ध के लिए गौतमपुरा निवासी महीनों पहले पेड़ों से हिंगोट तोड़कर इकट्ठा करते हैं और गूदा निकालकर छतों पर सूखने के लिए डाल देते हैं। फिर उसमें बारूद भरकर उसे तैयार करते हैं। हिंगोट को सीधी दिशा में चलाने के लिए हिंगोट में एक पतली बांस की डंडी डालकर उसे तीर जैसा बना दिया जाता है सुरक्षा के लिए दोनों दलों के योद्धाओं के हाथों में ढाल भी होती है।

संकेत मिलते ही शुरू हो जाता है युद्ध

सदियों पुरानी परंपरा या हिंसा? इंदौर में हिंगोट युद्ध का सच
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हिंगोट युद्ध के दिन तुर्रा और कंलगी दलों के योद्धा सिर पर पगड़ी, कंधों पर हिंगोट से भरा थैला और हाथ में ढाल (एक प्रकार की लाठी) लेकर नाचते-गाते शाम पांच बजे के बाद हिंगोट युद्ध मैदान की ओर निकल पड़ते हैं। मैदान के पास स्थित भगवान देवनारायण मंदिर में माथा टेकने के बाद वे मैदान में आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। फिर संकेत मिलते ही युद्ध शुरू कर देते हैं। करीब दो घंटे तक चलने वाले इस युद्ध में सामने वाले योद्धा द्वारा फेंके गए हिंगोट से कई योद्धा घायल हो जाते हैं। हिंगोट से निकलने वाली आग की रेखाएं आसमान में खिंच जाती हैं, जिससे एक सुंदर दृश्य बनता है।

हिंगोट युद्ध का इतिहास

हिंगोट युद्ध का इतिहास यह है कि यह गौतमपुरा और रुणजी के लोगों की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा है, जिसे यहां के लोग अपने पूर्वजों की विरासत मानते हैं और हर साल इस परंपरा का पालन करते हैं।

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